Tuesday, November 26, 2013

नरेंदर मोदी कैंसर का दूसरा नाम ...!


 

देश के तमाम मीडिया के प्रयासों ने नरेंदर मोदी को जाने-अनजाने में एक " राष्ट्रीय हीरो " बना दिया है। 

 

तमाम बिकाऊ  मीडिया के प्रयासों ने नरेंदर मोदी को एक विचारधारा का तगमा दे दिया है। मोदी अब एक व्यक्ति का नाम नहीं रहा एक विचाधारा का नाम हैं।  अगर इसे " मोदीवाद" कहा जाए , तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।   परन्तु जैसे जैस मोदी कि लोकप्रियता बड़ रही है। एक डर भी देश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग को सत्ता रहा है कि अगर " मोदीवाद " भविष्य में राजनितिक असर दिखता है तो  "मोदीवाद" भारत के  राजनैतिक , सामाजिक, व आर्थिक हालात पर क्या असर डालेगा ? हाँ यह एक गंभीर सवाल है।  इस सवाल का उत्तेर देने से पहले हमे मोदीवाद को समझने से पहले मोदी को समझना होगा।

                                         
बचपन आर.एस.एस. कैंप में
मोदी का जन्म  एक कट्टर हिन्दूवादी परिवार में हुआ था।  बचपन से (लगभद 8 साल   से ) ही मोदी संघ की क्लासों में जाता रहा है।  परिवारीक माहौल व कट्टरवादी शिक्षा ने मोदी को मानसिक रूप से अत्यंत कट्टर बना दिया।  कट्टर विचारधारा और अत्यंत महत्वाकांक्षी मोदी ने केशुभाई पटेल जैसे अपने सैंकड़ों पार्टी प्रतिद्वंदियों को ठिकाने लगा दिया।  अपनी  कट्टर विचारधारा को मोदी कभी भी हाशिये पर नहीं रखते। इसका परिचय नरेंदर मोदी ने सैकड़ों बार दिया है।  वर्ष २००२  का गुजरात नरसंहार , सैंकड़ों विरोधी अफसरों , कार्यकर्ताओं को ठिकाने लगाना , सद् भावना दिवस पर मुसलमानो से टोपी ना पहनना।  गैर हिन्दू दिवस में शिरकत न करना , आदि आदि... .    धार्मिक कट्टरवाद , चाहे वो मुस्लिम कट्टरवाद हो या हिन्दू कट्टरवाद  , किसी व्यक्ति , विशेष जाती, धर्म या किसी देश का भला नहीं कर सकता।  

                                         
मोदी आर.एस.एस. कैंप में
कट्टरवाद कभी भी देश, जाती या धर्म का भला नहीं कर सकता,  वो देश को , धर्म को तोड़ने का काम ही कर सकता है। कौन नहीं जनता कि पाकिस्तान मुस्लिम कट्टरपंथी देश है कट्टरवाद  उसके और पूरे विश्व के लिए सिरदर्द  बना हुआ है और पाक के विकास में बाधा भी।  बिलकुल इसी तरह का कट्टरवाद अब मोदीवाद का रूप ले रहा है जो झूठे गुजरात के विकास की आड़ में पनप रहा है।  गुजरात यात्रा से गुजरात विकास पोल खुल कर सामने आती हैं।  अत्यंत महंगाई , घोर गरीबी ,से गुजरात गुजर रहा है।  गुजरात में पेट्रोल की कीमत 78 रुपया व डीजल 59 रुपया प्रति लीटर है जोकि अन्य राज्यों  की तुलना में 8 से 9 रुपया प्रति लीटर अधिक हैं।   प्याज कि कीमतें भी गुजरात में अधिक हैं  हालाँकि गुजरात में दक्षिण भारतीय व्यंजन अधिक खाये जाते हैं जिसमें प्याज का इस्तेमाल किया  ही नहीं जाता । फिर भी कीमतें अधिक हैं  जो मुख्यमंत्री रह्कर अपने राज्य कि महंगाई कम  नहीं  कर सका। वक़्त आने पर देश कि मंगाई को  क्या ख़ाक कम करेगा। 

                                                   
 

गावों में स्कूलों की इमारतें न होना आम बात है। सैंकड़ों गावों में स्कूल आज भी छप्पर  के नीचे चलाये जाते हैं।  गांव घोर अनपढ़ता में डूबे हुए हैं।  सैंकड़ों गावों (0.2%) में अभी तक बिजली वयवस्था ही नहीं हैं।  सैंकड़ों ही गावों में अभी तक पीने के पानी की वयवस्था भी नहीं हैं। गुजरात प्रति वयक्ति आये में भी अन्य राज्यों की तुलना में पीछे है।  मनरेगा कि मजदूरी रेट भी अन्य राज्यों की तुलना में निम्न स्तर (147 रुपया ) पर हैं।  मोदी कि कट्टरता के बारे में एक और ताजा उदाहरण यह है की  भुज जिले के  बॉर्डर के साथ लगते कुछ गावों में पंजाब और हरियाणा से स्थापित  सिक्ख कृषकों को अब वहाँ से मुसलमानों कि तरह खदेड़ा जा रहा है।  खेलों में भी गुजरात राष्ट्रीय सतर पर पीछे है।  गुजरात सरकार कर्ज के बोझ तले  दबी हुऐ है।  राज्य सरकार के खजाने खली हैं।  

                                                 
गोधरा काण्ड  की याद

गावों और शहरों  में मोदी की हिंदूवादी कट्टरता की झलक साफ़ साफ़ दिखाई  देती  है।  चाहे मुस्लिम आबादी वाले गांव हों , गावों के मुख्य द्वारों पर हिन्दू देवी देवताओं कि मूर्तियां ही नज़र आयेंगी। ये सब मुस्लिम संस्कृति के घोर विरोध का प्रतीक है। मुस्लिम को अपनी जमीन बेचने का अधिकार है पर हिन्दू को जमीन बेचकर   पलायन करने का अधिकार नहीं है।   

 इतिहास गवाह है कि दशकों पहले मुसलमानों ने ही सबसे पहले गुजरात में व्यापार और उद्योग स्थापित किए। चाहे वो हीरा कारोबार हो या कपडा कारोबार , जिसकी बदोलत गुजरात में उद्योगिक माहोल बन पाया। ओधोगिक क्षेत्रों में में मुस्लिम लोगों कि अधिकता कट्टर हिन्दू वादी लोगों को रास नहीं आ रहा था।  जिसके चलते कट्टरता को 2002 में दंगों का रूप दे दिया गया  

 

           


गोधरा काण्ड में मारा गया एक व्यक्ति का शव

 

दुनिया भर का इतिहास गवाह है कि जब जब किसी देश कि सत्ता किसी धार्मिक कट्टर पार्टियों या कट्टर नेता के हाथ में जाती है तो वो राजनीतिक ताकतों से अपने धर्म को सर्वश्रेस्ट साबित करने कि कोशिश करता है। जिससे सम्परदािक्त देश को खोखला कर देती है।  देश विकास कि पटड़ी से उतर जाता है ।मुज़फरनगर दंगों का एक जीता जागता उदाहरण है,   देश में सम्प्र्दािक ताकतों  के कमजोर होने से मोदीवादी धार्मिक कट्टर ताकतों का प्रचार द्वारा हावी होना देश के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। सम्प्रदायिक ताकतों द्वारा 1984 के दंगों का जखम अभी देश भूला नहीं है. मोदीवादी सम्प्रदायिक ताकतों की सत्ता न आने पर या सत्ता हाथ से जाने पर पहले हिन्दू को मुस्लिम से , फिर हिन्दू को सिखों से, सव्यम् हिन्दू को हिन्दू से भिड़ाया जा सकता है। अगर भविष्ये में कट्टरवादी जड़ें और मजबूत होती नज़र आये तो ब्राह्मण अपने आपको सर्वश्रेष्ट साबित करने के लिए , शत्रिये , वैश , व शूदरों को नकली हिन्दू  साबित करने के लिए दंगो का सहारा ले सकता है।  जैसे कि पाकिस्तान में  शिया और सुन्नी मुस्लिम आये दिन एक दूसरे का खून बहाने में लगे हुए हैं 



अगर ऐसा हुआ तो मोदीवाद देश में कैंसर की तरेह फ़ैल जाएगा।  जिससे देश बचना  मुश्किल होगा।








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