पहीऐ के अविष्कार के बाद मानव ने तकनीक को विकसित करना शुरू कर दिया . कुछ देशों ने उत्पादन की तकनीक के विकास पर जोर दिया . तकनीक ने मानव के लिए असीमित उत्पादन करना शुरू कर दिया . असीमित उत्पादन के लिए उत्पादक देशो ने नई मंडियो को ढूँढने की जरुरत हुई . जिसके फलसवरूप आयत के साधन (समुंदरी जहाज , हवाई जहाज)विकसित हुए .इनका निर्माण युद्ध स्तर पर शुरू हुआ.
भारत पुरातन काल से ही अपनी गणित , विज्ञानं , भवन निर्माण कला , चिकित्सा , संस्कृति , हस्तशिल्प , डिजाइनिंग ,से दुनिया भर में परसिद्ध था . परन्तु पश्चिमी उद्योगिक विकास की तुलना में भारत की भवन निर्माण कला , चिकित्सा, संस्कृति, हस्तशिल्प, डिजाइनिंग तकनीकी रूप से पिछड़ गई .क्योंकि हमने विकसित हुई तकनीक के सिधांत (आम जनता के लिए शिक्षा का न होना ) को आम जनता से दूर(वंचित) रखा , जिससे तकनीक का निरंतर विकास नहीं हो सका .
तब भारत एक विशाल मंडी के रूप में देखा जाने लगा . डच ,फ़्रांसिसी अंग्रेजों से भारत को जूझना पड़ा . मंडियों के झगडे ने पूरे विश्व को युद्धों में धकेल दिया . परिणाम स्वरूप द्वितीय विश्व यूद्ध में विकसित हुई हथियारों की तकनीक ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया . इन हथियारों की तकनीक को भी कुछ देशों ने मानव सभ्यता के विनाश के लिए बाजारू बना दिया .
हमारा इतिहास हमें यह कहता है की राजसत्ता ने पुरातन विज्ञानं (तकनीक और खोजों) को निरंतर विकसित नहीं होने दिया . दूसरे शब्दों ये कहें की पुरातन (राज-दरबार) काल से ही विज्ञानिक व तकनीकी साहित्य के द्वार आम जनता के लिए बंद कर दिए . यह कूटनीति जनता पर अपनी सत्ता कायम रखने के लिए एक अचूक साधन तो बन गयी परन्तु हिंदुस्तान विज्ञानं और तकनीकी रूप से फिसड्डी हो गया .
हमारा वर्तमान इंजीनियरिंग और तकनीकी पाठ्यक्रम भी इसी पीड़ा से गुजर रहा है . वर्तमान इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम बहुत ही निचले (कक्षा बारह से भी निचले ) सत्र का है जिसमे व्यावहारिकता(practical) नहीं है . और वर्तमान तकनीकी व इंजीनियरिंग शिक्षा के पाठ्यकर्म का सवरूप पूंजीपतियों के निजी हितों के अनुरूप है जिससे वे सस्ते तकनीकी मजदूर पैदा कर सकें .हमारी वर्तमान सरकार व पूंजीपति वर्ग की इस मिलीभगत का यह नतीजा है की हमारा देश अपनी मूलभूत सुविधाओं का भी मोहताज है.
अमेरिका अपने बजट का १९ प्रतिशत अपनी शिक्षा पर खर्च करता है .मजे की बात यह भी है की अमेरिका की चार सबसे बड़ी टेक्निकल युनीवेर्सिटी अमेरिका के बजट में ३४ से 37 प्रतिशत का भी योगदान दे रही हैं . चीन भी अपने बजट का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च कर रहा है .चीन में IIT लेवल के 1100 इंजीनियरिंग महाविधाले हैं . वह भी दुनिया को मुट्ठी में करने का गुर्दा रखता है . परन्तु विडंबना है की हमारी सरकार शिक्षा पर मात्र २ प्रतिशत खर्च कर रही है . शिक्षा के निजीकरण से भी आम आदमी शिक्षा से दूर हो रहा है . यह सत्ता में बने रहने की वही नीतियाँ हैं जिससे आम आदमी पर राज तो किया जा सकता है परन्तु इससे आदमी और देश का विकास संभव नहीं हो सकता .